
नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संघ शिक्षा वर्ग समापन समारोह में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और सरसंघचालक मोहन भागवत एक सुर में बोलते दिखाई दिए। अपने-अपने अंदाज में दोनों ने माना कि विरोधी विचारों के बीच भी संवाद होना जरूरी है। संवाद से ही जटिल समस्याओं का हल निकल सकता है और इसी मार्ग से देश को आगे ले जा सकते हैं। पूर्व राष्ट्रपति ने अपने बहुप्रतीक्षित भाषण में कहा कि भारत की आत्मा बहुलतावाद और उदारता में बसती है।
हमारे समाज में यह बहुलतावाद सदियों से चले आ रहे तमाम विचारों के मिलन से आई है। सेक्युलरिज्म और सर्वसमावेशी विचार हमारी आस्था के विषय हैं। ये हमारी मिश्रित संस्कृति ही है, जिसके कारण हम एक राष्ट्र बन सके हैं। करीब 45 मिनट के संबोधन में उन्होंने कहा कि हिंदू एक उदार धर्म है। राष्ट्रवाद किसी धर्म और भाषा में बंटा हुआ नहीं है। उन्होंने सहनशीलता को समाज की ताकत बताया।
मुखर्जी के अनुसार हमारा राष्ट्रवाद कोई एक भाषा, एक धर्म या एक शत्रु से पैदा नहीं हुआ है। यह तो सवा अरब लोगों की सदाबहार सार्वभौमिकता का परिणाम है, जो अपने दैनिक जीवन में 122 भाषाएं इस्तेमाल करते हैं। सात विभिन्ना धमोर् को मानते हैं। जब यहां आर्य, मंगोल और द्रविड़ सभ्यताओं के लोग एक झंडे के नीचे भारतीय बनकर रहते हैं, और कोई किसी का शत्रु नहीं होता, तब हमारा भारत एक राष्ट्र बनता है। उन्होंने कहा कि संविधान से राष्ट्रवाद की भावना बहती है। 50 सालों में मैंने सार्वजनिक जीवन में जो सीखा है, उसके आधार पर कह रहा हूं कि विविधिता और सहिष्णुता में ही भारत बसता है।
भिन्न विचार को नजरअंदाज नहीं कर सकते
प्रणब दा ने कहा कि संवाद न सिर्फ विरोधी विचारों के बीच संतुलन बनाने के लिए, बल्कि सामंजस्य बैठाने के लिए भी जरूरी होता है। हम आपस में बहस कर सकते हैं। हम सहमत हो सकते हैं। हम सहमत नहीं भी हो सकते। लेकिन हम विचारों की बहुतायत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सिर्फ संवाद के जरिए ही हम जटिल समस्याओं को सुलझाने की राह पर आगे बढ़ सकते हैं।
समाज को हिंसा से दूर रखें
प्रणब दा अपने भाषण में हाल की कुछ अप्रिय घटनाओं की तरफ इशारा करना भी नहीं भूले। उन्होंने कहा कि जब भी किसी बच्चे या महिला के साथ बर्बरतापूर्ण व्यवहार होता है, तो भारत की आत्मा घायल होती है। उनके अनुसार, क्रोध जतानेके विभिन्ना तरीकों से हमारे सामाजिक ढांचे को क्षति पहुंच रही है। हम रोज अपने इर्द-गिर्द हिंसा बढ़ते देख रहे हैं। हमें अपने समाज को हर प्रकार की हिंसा से दूर रखना चाहिए। चाहे वह शारीरिक हो, या शाब्दिक। सिर्फ अहिंसात्मक समाज से ही लोकतंत्र में सभी वर्गों, खासतौर से वंचितों व पिछड़ों की भागीदारी सुनिश्चित की जा सकती है।
सुनहरे इतिहास को याद किया
उन्होंने भारत के सुनहरे इतिहास को याद करते कहा कि भारत लंबे समय से अपने सिल्क एवं मसालों के व्यापार के जरिए दुनिया से जुड़ा एक खुला समाज रहा है। दुनिया भर के व्यापारी एवं विद्वान यहां आते रहे हैं। इसी प्रकार अपने हिंदू प्रभाव के साथ बौद्ध धर्म भी यहां से मध्य एशिया, चीन एवं दक्षिणपूर्व एशिया में फैला। तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय दुनिया भर के विद्वानों को अपनी ओर आकर्षित करते रहे। इन शिक्षण संस्थानों के खुले माहौल में ही यहां चाणक्य के अर्थशास्त्र जैसा अद्भुत ग्रंथ लिखा गया। पिछले ढाई हजार वर्षों में भारत में कई शासक एवं संस्कृतियां आईं-गईं, लेकिन भारत की मूल आत्मा अक्षुण्ण रही है।
नेहरू को याद करना नहीं भूले
आधुनिक भारत का जिक्र आने पर जवाहरलाल नेहरू को याद करना भी नहीं भूले। उनकी डिस्कवरी ऑफ इंडिया पुस्तक का जिक्र करते हुए कहा कि मैं इस बात से सहमत हूं कि राष्ट्रवाद सिर्फ हिंदू, मुस्लिम, सिख एवं भारत में रह रहे अन्य समूहों के मिलन से ही आ सकता है। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि किसी मूल संस्कृति का लोप हो जाना चाहिए। इन सभी संस्कृतियों के सम्मिलन से ही राष्ट्र का निर्माण होता है।
-दादा बोले-
– सात धर्म, 122 भाषाएं, 1600 बोलियों के बावजूद सवा अरब भारतीयों की पहचान एक है।
– गांधी जी ने कहा था कि राष्ट्रवाद हिंसक और विध्वंसक नहीं होना चाहिए।
– विचारों की विविधता को हम नकार नहीं सकते हैं। हम असहमत हो सकते हैं लेकिन उसे खारिज नहीं कर सकते।
– विविधता और सहिष्णुता भारत की पहचान रही है। धर्मनिरपेक्षता हमारे लिए आस्था का मसला।
– सरदार पटेल ने 565 रियासतों को एक किया तो नेहरू जी ने भारत एक खोज में राष्ट्रवाद की नई परिभाषा बताई।
हेडगेवार को महान सपूत बताया
रेशिमबाग मैदान में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग के समापन समारोह में जाने से पहले प्रणब मुखर्जी संघ के संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार के घर एवं उनकी समाधि स्मृति मंदिर भी गए। उन्हें संकरी गलियों में पैदल चलकर वहां तक पहुंचना पड़ा। घर में प्रवेश से पहले पूर्व राष्ट्रपति ने अपने जूते भी उतारे। वहां विजिटर्स बुक में लिखा, “मैं भारत माता के महान सपूत को सम्मान और श्रद्धांजलि देने आया हूं।” आज के समारोह में भाग लेने के लिए विशेष रूप से पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के पुत्र सुनील शास्त्री, नेताजी सुभाषचंद्र बोस के परिवार से अर्धेंदु बोस, लेखक राजीव मल्होत्रा, उद्योगपति राजेंद्र प्रसाद एवं फुटबॉल खिलाड़ी कल्याण जी चौबे भी थे।



