इच्छा मृत्यु पर वो सबकुछ जो आपको जानना चाहिए

सुप्रीमकोर्ट ने इच्छा मृत्यु पर बहुप्रतीक्षित फैसला सुना दिया है. उसने पैसिव यूथनेशिया यानि निष्क्रिय इच्छामृत्यु को अनुमति दे दी है. लंबे समय से सरकार से इसे कानूनी दर्जा देने की मांग होती रही है. इसके सभी जरूरी पहलुओं और तथ्यों पर वो बातें पेश हैं, जो आपको जाननी चाहिए.

क्या है इच्छा मृत्यु
इच्छामृत्यु का मतलब किसी गंभीर और लाइलाज बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को दर्द से मुक्ति दिलाने के लिए डॉक्टर की सहायता से उसके जीवन का अंत करना है.
यूथनेशिया (Euthanasia) मूलतः ग्रीक (यूनानी) शब्द है. जिसमें Eu का मतलब अच्छी और Thanatos का अर्थ मृत्यु होता है. इसे मर्सी किलिंग भी कहा जाता है. दुनियाभर में इच्छा-मृत्यु की इजाज़त देने की मांग बढ़ी है.


क्या कहता है भारतीय क़ानून
भारत में इच्छा-मृत्यु और दया मृत्यु दोनों ही अवैधानिक कृत्य हैं ये भारतीय दंड विधान (आईपीसी) की धारा 309 के अंतर्गत आत्महत्या का अपराध है. लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु को अनुमति प्रदान की है.

सरकार का क्या कहना है
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था वह निष्क्रिय इच्छामृत्यु पर कानून बनाने की दिशा में काम रही है. केंद्र ने कोर्ट को बताया था कि मामले में गठित की गई कमिटी ने विशेष परिस्थितियों में पैसिव यूथनेशिया (कोमा में पड़े मरीज का लाइफ सपॉर्ट सिस्टम हटाने) को सही बताया है, लेकिन लिविंग विल का सरकार समर्थन नहीं करती.

क्या है सक्रिय और निष्क्रिय इच्छामृत्यु
इच्छामृत्यु को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है. पहली सक्रिय इच्छामृत्यु (ऐक्टिव यूथेनेजिया) और दूसरी निष्क्रिय इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेजिया).सक्रिय इच्छामृत्यु में लाइलाज बीमारी से पीड़ित व्यक्ति के जीवन का अंत डॉक्टर की सहायता से उसे जहर का इंजेक्शन देने जैसा कदम उठाकर किया जा सकता है.
निष्क्रिय इच्छामृत्यु यानि वो मामले, जहां लाइलाज बीमारी से पीड़ित व्यक्ति लंबे समय से कोमा में हो. तब रिश्तेदारों की सहमति से डॉक्टर उसके जीवनरक्षक उपकरण बंद कर देते हैं. उसके जीवन का अंत हो जाता है. हालांकि बहुत से लोग मानते हैं कि सक्रिय हो या निष्क्रिय, इच्छामृत्यु हत्या है.

इच्छा मृत्यु का वसीयत के साथ क्या संबंध है
सुप्रीम कोर्ट में जो मामला चल रहा है, उसमें मरणासन्न व्यक्ति द्वारा इच्छा मृत्यु के लिए लिखी गई वसीयत (लिविंग विल) को मान्यता देने की मांग की गई है. ‘लिविंग विल’ एक लिखित दस्तावेज होता है जिसमें कोई मरीज पहले से इच्छा जाहिर करता है कि मरणासन्न स्थिति में पहुंचने या रजामंदी नहीं दे पाने की स्थिति में पहुंचने पर उसे किस तरह का इलाज दिया जाए. सुप्रीम कोर्ट ने लिविंग विल को मंजूरी नहीं दी है.

सुप्रीम कोर्ट में कब हुई थी आखिरी सुनवाई

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने पिछले साल 11 अक्टूबर को इस याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया था. अब 09 मार्च को इस पर फैसला दे दिया.

कौन है संविधान पीठ में
पांच सदस्यीय संविधान बेंच में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के अलावा जस्टिस एके. सिकरी, जस्टिस एएम. खानविलकर, जस्टिस डीवाई. चंद्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण शामिल हैं.

किसने दायर की थी याचिका 
एनजीओ कॉमन कॉज ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा था कि संविधान के आर्टिकल 21 के तहत जिस तरह नागरिकों को जीने का अधिकार दिया गया है, उसी तरह उन्हें मरने का भी अधिकार है. कॉमन कॉज के वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों को ‘लिविंग विल’ बनाने का हक होना चाहिए. खासकर वो पैसिक यूथनेशिया की पैरवी कर रहे हैं.

क्या इसका गलत उपयोग हो सकता है
हां. ऐसा हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने खुद आशंका जाहिर की थी कि कि आजकल मध्यम वर्ग में वृद्धों को बोझ समझा जाता है. उन्हें उनके संबंधी इच्छा मृत्यु दे सकते हैं. साथ ही इस मुद्दे से क़ानूनी के अलावा मेडिकल और सामाजिक पहलू भी जुड़े हुए हैं.

किन देशों में है इच्छा मृत्यु का प्रावधान
अमेरिका – यहां सक्रिय इच्छा मृत्यु ग़ैर-क़ानूनी है लेकिन ओरेगन, वॉशिंगटन और मोंटाना राज्यों में डॉक्टर की सलाह और उसकी मदद से मरने की इजाज़त है.

स्विट्ज़रलैंड – यहां ख़ुद से ज़हरीली सुई लेकर आत्महत्या करने की इजाज़त है, हालांकि इच्छा मृत्यु ग़ैर- क़ानूनी है.

नीदरलैंड्स – यहां डॉक्टरों के हाथों सक्रिय इच्छा मृत्यु और मरीज की मर्ज़ी से दी जाने वाली मृत्यु पर दंडनीय अपराध नहीं है.

बेल्जियम – यहां सितंबर 2002 से इच्छा मृत्यु वैधानिक हो चुकी है.

ब्रिटेन, स्पेन, फ्रांस और इटली जैसे यूरोपीय देशों सहित दुनिया के ज़्यादातर देशों में इच्छा मृत्यु ग़ैर-क़ानूनी है.

क्या था टेरी शियावो का चर्चित मामला
पिछले साल अमेरिकी की 41 साल की टेरी शियावो का निधन हो गया. फ़्लोरिडा की शियावो को 1990 में दिल का दौरा पड़ा. उनका दिमाग़ तब से मौत तक सुन्न ही रहा. टेरी की जीवन-मृत्यु को लेकर सात साल तक क़ानूनी लड़ाई चली. टेरी के पति चाहते थे कि उनकी पत्नी त्रासदायी जीवन से मुक्ति पाकर मौत की गोद में आराम करे. लेकिन टेरी के माता-पिता बेटी को जीवित रखना चाहते थे. आख़िरकार टेरी के पति को अदालत से मंज़ूरी मिल गई. इसके बाद टेरी की आहार नली को हटा लिया गया था.

भारत के मामले
– बिहार पटना के निवासी तारकेश्वर सिन्हा ने 2005 में राज्यपाल को याचिका दी कि उनकी पत्नी कंचनदेवी वर्ष 2000 से बेहोश हैं. उन्हें दया मृत्यु देने की अनुमति दी जाए.

– केरल हाईकोर्ट ने दिसम्बर 2001 में असाध्य रोग से पीड़ित बीके पिल्लई को इच्छा-मृत्यु की अनुमति नहीं दी, क्योंकि भारत में ऐसा कोई क़ानून नहीं है.

– 2005 में काशीपुर उड़ीसा के निवासी मोहम्मद युनूस अंसारी ने राष्ट्रपति से अपील की थी कि उनके चार बच्चे असाध्य बीमारी से पीड़ित हैं. उनके इलाज के लिए पैसा नहीं है. लिहाज़ा उन्हें दया मृत्यु की इजाज़त दी जाए. किंतु अपील नामंज़ूर कर दी गई.

पुराणों और इतिहास में इच्छा मृत्यु
– महाभारत के दौरान महान योद्धा भीष्म पितामह को इच्छा-मृत्यु का वरदान हासिल था. उन्होंने शर-शैया पर लेटे रहकर अपनी इच्छा से प्राण त्याग दिए.

– सीता जी ने धरती की दरार में कूदकर अपनी जान दे दी थी, श्री राम और लक्ष्मण जी ने सरयू नदी में जलसमाधि ली थी, स्वामी विवेकानन्द ने स्वेच्छा से योगसमाधि की विधि से प्राण त्यागे थे. पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने भी अपनी मृत्यु की तारीख और समय कई वर्ष पूर्व तय कर ली थी.

– आचार्य विनोबा भावे ने अपने अंतिम दिनों में इच्छा-मृत्यु का वरण किया जब उन्होंने स्वयं पानी लेने तक का त्याग कर दिया था। इंदिरा गांधी उन्हें देखने के लिए गईं थीं. तब वहां मौजूद पत्रकारों की यह मांग ठुकरा दी गई थी कि भावे जी को अस्पताल में दाख़िला किया जाए.

– जैन मुनियों और जैन धर्मावलंबियों में संथारा की प्रथा भी इच्छा मृत्यु का ही एक प्रकार है. जो बरसों से प्रचलित है.